पाठ्यक्रम: GS3/ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- 2025 में चीन द्वारा रेयर अर्थ मैग्नेट (दुर्लभ मृदा चुंबक) तथा संबंधित खनिजों के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों ने स्थायी-मैग्नेट क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण चरणों के लिए भारत की निर्भरता को उजागर किया।
रेयर अर्थ मैग्नेट (दुर्लभ मृदा चुंबक) क्या हैं?
- दुर्लभ मृदा तत्व 17 तत्वों का एक समूह हैं, जिसमें 15 लैंथेनाइड तत्वों के साथ-साथ स्कैंडियम और इट्रियम शामिल हैं।
- नियोडिमियम, प्रसीओडिमियम, डिस्प्रोसियम और टर्बियम जैसे दुर्लभ मृदा तत्व उच्च-प्रदर्शन वाले स्थायी चुम्बकों के निर्माण में महत्त्वपूर्ण होते हैं।
- रेयर अर्थ मैग्नेट (दुर्लभ मृदा चुंबक) के दो प्रमुख प्रकार हैं—नियोडिमियम (Nd-Fe-B) तथा सैमरियम कोबाल्ट (SmCo) चुम्बक।
- नाम में ‘दुर्लभ’ होने के बावजूद दुर्लभ मृदा तत्व भूगर्भीय दृष्टि से अत्यंत दुर्लभ नहीं हैं। हालांकि, इनके बिखरे हुए भंडारों के कारण आर्थिक रूप से इनका निष्कर्षण कठिन होता है तथा खनन की पर्यावरणीय लागत भी अधिक होती है।
रेयर अर्थ मैग्नेट (दुर्लभ मृदा चुंबक) की उपलब्धता
- चीन वैश्विक रेयर अर्थ मैग्नेट (दुर्लभ मृदा चुंबक) उत्पादन के 85% से अधिक हिस्से को नियंत्रित करता है तथा खनन से लेकर परिशोधन और चुम्बक निर्माण तक पूरी आपूर्ति शृंखला में उसका प्रभुत्व है।
- भारत के पास दुर्लभ मृदा तत्वों के पर्याप्त भंडार हैं, विशेष रूप से केरल, तमिलनाडु और ओडिशा के मोनाजाइट-युक्त बालू में। हालांकि, भारत में उन्नत परिशोधन क्षमताओं तथा डाउनस्ट्रीम मैग्नेट निर्माण उद्योग का अभी अभाव है।
भारत के लिए महत्त्व
- ऊर्जा संक्रमण: उच्च-प्रदर्शन वाले चुम्बकों का उपयोग इलेक्ट्रिक वाहन मोटरों तथा नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों में किया जाता है। इसलिए चुम्बकों की आपूर्ति की सुरक्षा भारत के डीकार्बोनाइजेशन लक्ष्यों के लिए महत्त्वपूर्ण है।
- उन्नत विनिर्माण को सुदृढ़ करना: रोबोटिक्स, स्वचालन, सटीक मशीनरी तथा अन्य उच्च-प्रौद्योगिकी उद्योग कॉम्पैक्ट और शक्तिशाली स्थायी चुम्बकों पर तीव्रता से निर्भर हो रहे हैं।
- रणनीतिक सुरक्षा को बढ़ावा देना: स्थायी चुम्बकों का उपयोग एयरोस्पेस, रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा उन्नत हथियार प्रणालियों में होता है। इसलिए इनकी आपूर्ति शृंखला रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- बाहरी निर्भरता को कम करना: संपूर्ण मूल्य शृंखला में घरेलू क्षमताओं का विकास कुछ सीमित विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर अत्यधिक निर्भरता को कम कर सकता है तथा भारत की आपूर्ति शृंखला की प्रत्यास्थता को बढ़ा सकता है।

चुनौतियाँ
- निम्न-ग्रेड संसाधन: भारत के पास दुर्लभ मृदा संसाधनों का पर्याप्त आधार है, लेकिन इनमें से अधिकांश निम्न-ग्रेड के हैं और मोनाजाइट जैसे रेडियोधर्मी खनिजों से जुड़े हुए हैं। इससे इनका निष्कर्षण जटिल और महंगा हो जाता है।
- सीमित मिडस्ट्रीम क्षमताएँ: भारत में खनन, पृथक्करण तथा दुर्लभ मृदा ऑक्साइड के उत्पादन की क्षमताएँ विद्यमान हैं, लेकिन औद्योगिक स्तर पर धातु, मिश्रधातु तथा स्थायी मैग्नेट के उत्पादन की क्षमता अभी सीमित है।
- आयातित चुम्बकों पर निर्भरता: घरेलू दुर्लभ मृदा संसाधन होने के बावजूद भारत दुर्लभ मृदा स्थायी मैग्नेट तथा संबंधित उत्पादों के लिए आयात पर निर्भर है, विशेषकर उन्नत विनिर्माण अनुप्रयोगों के लिए।
भारत द्वारा उठाए गए कदम
- राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM): 2025 में ₹34,300 करोड़ के कुल परिव्यय के साथ राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन को मंजूरी दी गई। यह मिशन अन्वेषण और खनन से लेकर लाभकारीकरण, प्रसंस्करण तथा पुनर्चक्रण तक संपूर्ण क्रिटिकल मिनरल मूल्य शृंखला को समाहित करता है।
- सरकार ने भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के माध्यम से क्रिटिकल मिनरल्स के अन्वेषण का विस्तार किया है तथा अधिक व्यापक अन्वेषण और खनन को सुगम बनाने के लिए खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 में संशोधन किया है।
- दुर्लभ मृदा खनिजों से संबंधित ब्लॉकों सहित क्रिटिकल मिनरल ब्लॉकों की नीलामी भी की गई है।
- सिंटर्ड रेयर अर्थ स्थायी मैग्नेटों के विनिर्माण को बढ़ावा देने की योजना: 2025 में ₹7,280 करोड़ के वित्तीय परिव्यय के साथ इस योजना को मंजूरी दी गई।
- इसका उद्देश्य भारत में प्रतिवर्ष 6,000 मीट्रिक टन (MTPA) की एकीकृत रेयर अर्थ स्थायी मैग्नेट (REPM) विनिर्माण क्षमता स्थापित करना है।
- खानिज विदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL): KABIL की स्थापना विदेशों में क्रिटिकल मिनरल परिसंपत्तियों के अधिग्रहण तथा लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा तत्वों जैसे खनिजों की दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए की गई है।
- रणनीतिक चुम्बक विनिर्माण: विशाखापट्टनम (Vizag) में रेयर अर्थ स्थायी मैग्नेट संयंत्र स्थापित किया गया है, जहाँ सैमरियम-कोबाल्ट (SmCo) चुम्बकों का स्वदेशी उत्पादन किया जा रहा है। यह विशेष रूप से रक्षा तथा परमाणु ऊर्जा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों के लिए महत्त्वपूर्ण है।
- दुर्लभ मृदा कॉरिडोर: केंद्रीय बजट 2026–27 में दुर्लभ मृदा पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने के लिए ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में समर्पित दुर्लभ मृदा कॉरिडोर स्थापित करने की घोषणा की गई।
आगे की राह
- क्रिटिकल मिनरल सुरक्षा केवल खनिजों के भंडार पर निर्भर नहीं करती; यह उन खनिजों को रणनीतिक औद्योगिक उत्पादों में परिवर्तित करने की तकनीकी क्षमता पर भी निर्भर करती है।
- एक राष्ट्रीय डेटाबेस विकसित किया जाना चाहिए, जिसमें संसाधनों, प्रसंस्करण क्षमता, प्रौद्योगिकी के स्वामित्व, व्यापार प्रवाह तथा डाउनस्ट्रीम अनुप्रयोगों से संबंधित सूचनाओं को एकीकृत किया जाए।
- केवल खनन पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय पृथक्करण, परिशोधन, मिश्रधातु उत्पादन तथा उच्च-प्रदर्शन वाले चुम्बकों के विनिर्माण पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए।
स्रोत: TH
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